कवर्धा। छत्तीसगढ़ के कवर्धा में नवरात्रि की महाअष्टमी पर सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा के अनुसार मध्यरात्रि में खप्पर यात्रा निकाली गई। देवी आराधना, आस्था और पारंपरिक अनुष्ठानों से जुड़े इस आयोजन में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। आधी रात को नगर के प्रमुख मंदिरों से निकली खप्पर यात्रा को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग सड़कों और चौक-चौराहों पर मौजूद रहे। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने भी देवी स्वरूप खप्पर के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
कवर्धा की खप्पर यात्रा अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं और रियासत काल से चली आ रही परंपरा के लिए जानी जाती है। महाअष्टमी की रात आयोजित इस यात्रा में देवी के स्वरूप को विशेष विधि-विधान के साथ नगर भ्रमण कराया जाता है। परंपरा के अनुसार, यात्रा के दौरान तलवार धारण किए देवी स्वरूप के दर्शन होते हैं। श्रद्धालु इसे शक्ति की आराधना, बुराई पर अच्छाई की जीत और नगर की सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा धार्मिक अनुष्ठान मानते हैं।

इस बार भी खप्पर यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखने को मिला। चंडी मंदिर, दंतेश्वरी मंदिर और परमेश्वरी मंदिर से निर्धारित समय पर यात्राएं निकाली गईं। नगर के विभिन्न मोहल्लों और प्रमुख मार्गों से गुजरने के बाद खप्पर अपने-अपने मंदिरों में पहुंचे, जहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। पुलिस और प्रशासन ने आयोजन को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी। यात्रा मार्गों पर पुलिस बल तैनात रहा और निगरानी के लिए ड्रोन कैमरों का इस्तेमाल किया गया।
तीन मंदिरों से आधी रात को शुरू हुई खप्पर यात्रा
कवर्धा में महाअष्टमी की रात खप्पर यात्रा का आयोजन परंपरागत तरीके से किया गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, रात करीब 12:30 बजे नगर के तीन प्रमुख मंदिरों—चंडी मंदिर, दंतेश्वरी मंदिर और परमेश्वरी मंदिर—से खप्पर यात्राएं शुरू हुईं। तीनों मंदिरों से लगभग 15-15 मिनट के अंतराल पर यात्राएं निकाली गईं, ताकि धार्मिक विधान निर्धारित क्रम में पूरे किए जा सकें।
यात्रा शुरू होने के साथ ही नगर में देवी आराधना का माहौल बन गया। श्रद्धालु देवी स्वरूप के दर्शन करने के लिए मार्गों पर एकत्रित हुए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, खप्पर यात्रा के दौरान देवी के स्वरूप का नगर भ्रमण क्षेत्र की रक्षा, शांति और समृद्धि की कामना से जुड़ा हुआ है।
महाअष्टमी की मध्यरात्रि में होने वाला यह आयोजन कवर्धा की विशिष्ट धार्मिक पहचान का हिस्सा है। स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए खप्पर यात्रा केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को निभाने का अवसर भी है।
तलवार धारण किए देवी स्वरूप के हुए दर्शन
खप्पर यात्रा के दौरान देवी के पारंपरिक स्वरूप के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आकर्षण रहे। धार्मिक परंपरा के अनुसार, खप्पर यात्रा शक्ति की उपासना से जुड़ी हुई है। देवी के स्वरूप के साथ तलवार का होना शक्ति, साहस और अधर्म के विनाश का प्रतीक माना जाता है।
रात के समय मंदिरों से निकलने वाली यात्राओं में पारंपरिक धार्मिक वातावरण देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने दर्शन कर देवी से परिवार की सुख-शांति और क्षेत्र की खुशहाली की कामना की। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने भी इस धार्मिक आयोजन में पहुंचकर देवी स्वरूप खप्पर के दर्शन किए और आशीर्वाद प्राप्त किया।
खप्पर यात्रा की विशेषता इसका रात्रिकालीन आयोजन और पारंपरिक स्वरूप है। महाअष्टमी के अवसर पर निकाली जाने वाली यह यात्रा कवर्धा की धार्मिक विरासत को प्रदर्शित करती है।
देवांगनपारा से राजमहल चौक तक नगर भ्रमण
तीनों मंदिरों से निकलने के बाद खप्पर यात्रा नगर के प्रमुख मार्गों और चौक-चौराहों से होकर आगे बढ़ी। यात्रा के निर्धारित मार्ग में देवांगनपारा, ठाकुरपारा, एकता चौक, सिग्नल चौक, डॉ. भीमराव अंबेडकर चौक, राजमहल चौक और गुप्ता पारा सहित कई क्षेत्र शामिल रहे।
नगर भ्रमण के दौरान विभिन्न मोहल्लों में श्रद्धालु देवी स्वरूप के दर्शन के लिए एकत्रित हुए। खप्पर यात्रा निर्धारित मार्गों से गुजरते हुए आगे बढ़ी और धार्मिक विधान के अनुसार अपने-अपने मंदिरों में पहुंची। इसके बाद मंदिर परिसरों में पूजा-अर्चना की गई और परंपरागत अनुष्ठान पूरे किए गए।
यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के कारण नगर के प्रमुख मार्गों पर चहल-पहल बनी रही। धार्मिक आयोजन के समापन के बाद बड़ी संख्या में वाहनों के सड़कों पर निकलने से शहर के कुछ हिस्सों में कई घंटों तक जाम की स्थिति भी बनी रही। हालांकि, यातायात संबंधी इन परेशानियों के बावजूद खप्पर यात्रा शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई।
रियासत काल से चली आ रही है खप्पर यात्रा की परंपरा
कवर्धा की खप्पर यात्रा को रियासत काल से चली आ रही धार्मिक परंपरा के रूप में देखा जाता है। यह आयोजन स्थानीय आस्था और देवी उपासना से गहराई से जुड़ा हुआ है। नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है और महाअष्टमी की रात खप्पर यात्रा के माध्यम से शक्ति आराधना की विशेष परंपरा निभाई जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, खप्पर का संबंध भगवान शिव के भैरव स्वरूप और मां दुर्गा के काली स्वरूप से जोड़ा जाता है। खप्पर को पारंपरिक रूप से एक विशेष पात्र माना जाता है, जिसका धार्मिक अनुष्ठानों में महत्व है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, खप्पर यात्रा का उद्देश्य नगर और आसपास के क्षेत्र की सुख-शांति, समृद्धि तथा विपत्तियों से रक्षा की कामना करना है। इसी वजह से इस आयोजन में श्रद्धालुओं की गहरी आस्था जुड़ी रहती है। हर वर्ष महाअष्टमी के अवसर पर होने वाली यह यात्रा धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम बनती है।
मां काली और रक्तबीज की कथा से जुड़ी है मान्यता
खप्पर के धार्मिक महत्व को मां काली और रक्तबीज से जुड़ी पौराणिक कथा के संदर्भ में भी समझा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, रक्तबीज नामक असुर के रक्त की बूंदें धरती पर गिरने से उसके समान नए असुर उत्पन्न हो जाते थे। ऐसी स्थिति में मां काली ने उसके रक्त को धरती पर गिरने से रोकने के लिए उसे अपने खप्पर में धारण किया था।
इस कथा के कारण खप्पर को बुराई के विनाश और नकारात्मक शक्तियों पर विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। हालांकि, यह धार्मिक मान्यता और पौराणिक परंपरा से जुड़ा विश्वास है।
कवर्धा में खप्पर यात्रा के दौरान भी श्रद्धालु इसे देवी शक्ति की आराधना और क्षेत्र की मंगलकामना से जोड़कर देखते हैं। नगर भ्रमण की परंपरा के पीछे भी स्थानीय धार्मिक विश्वासों का महत्वपूर्ण स्थान है।
कठिन साधना और नियमों के साथ निभाया जाता है अनुष्ठान
खप्पर यात्रा से जुड़ी परंपराओं में साधना और अनुशासन का भी महत्व बताया जाता है। मान्यता के अनुसार, अनुष्ठान में शामिल कुछ साधक यात्रा से पहले उपवास, ब्रह्मचर्य और मौन व्रत जैसे नियमों का पालन करते हैं। इन नियमों को देवी के प्रति समर्पण और साधना की तैयारी का हिस्सा माना जाता है।
परंपरा में खप्पर और अग्नि से जुड़े अनुष्ठानों का भी उल्लेख मिलता है। कुछ धार्मिक आयोजनों में जलते अंगारों से संबंधित विधान निभाए जाते हैं, जिन्हें श्रद्धालु आस्था और तपस्या से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, प्रत्येक आयोजन में इन सभी विधानों का स्वरूप समान हो, यह जरूरी नहीं है।
कवर्धा की खप्पर यात्रा की पहचान उसके पारंपरिक स्वरूप, देवी आराधना और सामूहिक धार्मिक सहभागिता से बनी हुई है। इस आयोजन में स्थानीय समुदाय की भागीदारी इसकी सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाती है।
सुरक्षा के लिए पुलिस बल तैनात, ड्रोन से निगरानी
महाअष्टमी की मध्यरात्रि में निकलने वाली खप्पर यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी को देखते हुए पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए। यात्रा मार्गों पर पर्याप्त संख्या में पुलिस जवानों की तैनाती की गई, ताकि लोगों की आवाजाही और आयोजन की व्यवस्था बनाए रखी जा सके।
इसके अलावा, पूरे आयोजन पर नजर रखने के लिए ड्रोन कैमरों की मदद ली गई। इससे यात्रा मार्गों और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों की निगरानी की गई। प्रशासन ने सोशल मीडिया पर भी नजर रखी, ताकि किसी भी तरह की भ्रामक या भड़काऊ पोस्ट से माहौल प्रभावित न हो।
रात के समय होने वाले धार्मिक आयोजन में सुरक्षा व्यवस्था महत्वपूर्ण रहती है। इसी को ध्यान में रखते हुए पुलिस और प्रशासन ने निगरानी के उपाय अपनाए। खप्पर यात्रा निर्धारित मार्गों से गुजरते हुए शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई।
यात्रा के बाद कई घंटे तक जाम, फिर सामान्य हुई आवाजाही
खप्पर यात्रा के समापन के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने घरों की ओर लौटे। इस दौरान वाहनों की आवाजाही बढ़ने से नगर के कुछ हिस्सों में कई घंटों तक जाम की स्थिति बनी रही। प्रमुख मार्गों और चौक-चौराहों पर यातायात का दबाव बढ़ने से लोगों को आवागमन में परेशानी का सामना करना पड़ा।
इसके बावजूद धार्मिक आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से पूरा हुआ। प्रशासन की निगरानी और सुरक्षा इंतजामों के बीच श्रद्धालुओं ने देवी स्वरूप के दर्शन किए और परंपरा में भाग लिया।
कुल मिलाकर, कवर्धा में महाअष्टमी की मध्यरात्रि को निकली खप्पर यात्रा ने एक बार फिर शहर की धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक परंपरा को सामने रखा। तीन मंदिरों से शुरू हुई यात्राओं ने नगर के प्रमुख क्षेत्रों का भ्रमण किया। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने भी दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। पुलिस की तैनाती, ड्रोन से निगरानी और प्रशासनिक इंतजामों के बीच यह आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।
