Business Desk: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है। 6 नवंबर को ब्रेंट क्रूड का भाव बढ़कर करीब 99.86 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया है, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड 91.62 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। दोनों प्रमुख बेंचमार्क में लगातार दूसरे दिन तेजी दर्ज की गई है। कच्चे तेल की कीमतों में आई इस उछाल ने भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है। अगर कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो इसका असर देश के आयात बिल, रुपये की कीमत, पेट्रोल-डीजल और आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।
100 डॉलर के करीब पहुंचा ब्रेंट क्रूड
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के करीब पहुंच गई है। 6 नवंबर को ब्रेंट क्रूड करीब 99.86 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता नजर आया। वहीं अमेरिकी बेंचमार्क WTI क्रूड का भाव बढ़कर लगभग 91.62 डॉलर प्रति बैरल हो गया।

इससे पहले अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखने को मिली थी। बाजार में मांग और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को लेकर बनी उम्मीदों के बीच तेल के दाम नीचे आए थे। लेकिन अब लगातार दूसरे दिन तेजी ने बाजार का रुख बदल दिया है।
कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर केवल तेल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। दुनिया भर में ऊर्जा की लागत, परिवहन, उद्योग और व्यापार इससे प्रभावित होते हैं। भारत जैसे देश, जहां घरेलू जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा होता है, वहां इसका प्रभाव अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की क्या है वजह?
कच्चे तेल की कीमतों में हालिया तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई बाधित होने की आशंका मानी जा रही है। खाड़ी क्षेत्र में तेल टैंकरों पर नए हमलों की खबरों ने समुद्री रास्तों से होने वाली तेल आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है।
खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर बाजार की नजर बनी हुई है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल परिवहन मार्गों में से एक है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचते हैं। यदि यहां आवाजाही प्रभावित होती है, तो वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है।
इसके अलावा ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने की संभावनाओं को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। निवेशक इस बात का आकलन कर रहे हैं कि आने वाले दिनों में क्षेत्रीय हालात किस दिशा में जाएंगे। सप्लाई में रुकावट की आशंका बढ़ने पर कारोबारी भविष्य में तेल की उपलब्धता को लेकर सतर्क हो जाते हैं, जिससे कीमतों में तेजी आ सकती है।
भारत पर क्या होगा कच्चे तेल की तेजी का असर?
भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ सकता है। भारत को कच्चा तेल खरीदने के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है, जिससे देश का आयात बिल बढ़ सकता है।
इसके साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत पर भी दबाव पड़ने की आशंका रहती है। जब तेल आयात महंगा होता है, तो भुगतान के लिए अधिक डॉलर की जरूरत पड़ सकती है। यदि रुपये में कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी एक साथ देखने को मिलती है, तो भारत के लिए तेल आयात की लागत और बढ़ सकती है।
1. पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव
कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से पेट्रोल और डीजल के उत्पादन की लागत प्रभावित होती है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का मतलब यह नहीं है कि घरेलू पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत बढ़ जाएंगे। भारत में खुदरा ईंधन की कीमतें तेल कंपनियों की लागत, टैक्स, रुपये की विनिमय दर और अन्य कारकों पर निर्भर करती हैं।
यदि कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव बढ़ सकता है।
2. महंगाई बढ़ने की आशंका
डीजल का इस्तेमाल ट्रक, बस, कृषि उपकरण और माल ढुलाई के कई साधनों में होता है। ऐसे में ईंधन महंगा होने पर परिवहन लागत बढ़ सकती है। इसका असर खाद्य पदार्थों, रोजमर्रा की जरूरतों के सामान और अन्य उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
अगर कंपनियों की उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ती है, तो वे इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं। इससे महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है।
3. रुपये और विदेशी मुद्रा भंडार पर असर
कच्चे तेल का आयात भारत के विदेशी मुद्रा खर्च का एक बड़ा हिस्सा है। तेल की कीमतें बढ़ने पर आयात के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ सकते हैं। इससे रुपये पर दबाव बढ़ने की संभावना रहती है।
हालांकि, रुपये की चाल केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करती। अमेरिकी डॉलर की मजबूती, विदेशी निवेश, वैश्विक बाजार की स्थिति और देश के व्यापार संतुलन जैसे कारक भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
4. सरकार के बजट पर बढ़ सकता है दबाव
यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो सरकार के सामने भी चुनौती बढ़ सकती है। पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स में बदलाव, महंगाई को नियंत्रित रखने के उपाय और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा।
तेल की ऊंची कीमतों का असर देश के चालू खाते के घाटे और व्यापक आर्थिक संतुलन पर भी पड़ सकता है।
क्या तुरंत महंगा हो जाएगा पेट्रोल-डीजल?
ब्रेंट क्रूड के 100 डॉलर के करीब पहुंचने से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी तय नहीं है। घरेलू ईंधन के दाम कई कारकों के आधार पर तय होते हैं। इनमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति, रिफाइनिंग लागत, केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स तथा तेल विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति शामिल हैं।
इसलिए अगर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी कुछ दिनों तक रहती है, तो उसका असर सीमित भी हो सकता है। लेकिन यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो ईंधन की कीमतों और महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
आगे कच्चे तेल की कीमतों पर किन बातों की रहेगी नजर?
आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार के निवेशकों की नजर मुख्य रूप से पश्चिम एशिया के हालात पर रहेगी। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव, खाड़ी क्षेत्र में तेल टैंकरों की सुरक्षा और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होने वाली सप्लाई बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
अगर समुद्री रास्तों से तेल की आवाजाही प्रभावित होती है या सप्लाई बाधित होने का खतरा बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। वहीं, तनाव कम होने और वैश्विक आपूर्ति सामान्य रहने पर कीमतों में गिरावट या स्थिरता देखने को मिल सकती है।
भारत के लिए फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी कितने समय तक बनी रहती है। कुछ समय की तेजी का असर सीमित रह सकता है, लेकिन लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कीमतें बने रहने पर देश के आयात बिल, रुपये, ईंधन लागत और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।